जिंदगी की सच्चाई: उम्र के हर पड़ाव का कड़वा सचविशेष रिपोर्ट | झारखंड आजतक

जिंदगी की सच्चाई: उम्र के हर पड़ाव का कड़वा सच
विशेष रिपोर्ट | झारखंड आजतक
आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में इंसान पैसा, पद, प्रतिष्ठा और भविष्य की चिंता में इतना उलझ गया है कि वर्तमान में जीना ही भूल गया है। लेकिन उम्र के अलग-अलग पड़ाव पर पहुंचते ही जिंदगी की कुछ ऐसी सच्चाइयाँ सामने आती हैं, जो सोचने पर मजबूर कर देती हैं।
40 साल की उम्र के बाद कई बार पढ़ाई और डिग्री की अहमियत कम होती नजर आती है। कई बार ऐसा देखने को मिलता है कि एक साधारण चाय बेचने वाला, जिसे समाज अनपढ़ मानता है, उसकी आमदनी एक पढ़े-लिखे नौकरीपेशा व्यक्ति से ज्यादा होती है, और वह भी बिना टैक्स के। यह सच्चाई कई लोगों के लिए बड़ा झटका होती है।
50 की उम्र के बाद सुंदरता की चमक भी धीरे-धीरे फीकी पड़ने लगती है। चेहरा बदल जाता है और लोग सजने-संवरने में भी रुचि खोने लगते हैं।
60 की उम्र आते-आते पद और प्रतिष्ठा का रुतबा भी खत्म हो जाता है। जिस कुर्सी से कभी पूरे शहर का काम चलता था, उसी जगह पर व्यक्ति को पहचान मिलना भी मुश्किल हो जाता है।
70 साल की उम्र में बड़ा घर भी बोझ लगने लगता है। सीढ़ियाँ चढ़ना मुश्किल हो जाता है और तब छोटा, सादा घर ही सुकून देता है।
80 साल की उम्र के बाद बैंक अकाउंट में पड़े करोड़ों रुपये भी किसी काम के नहीं रह जाते, जब रोजमर्रा की जिंदगी दवाइयों और इलाज तक सिमट जाती है।
पूरी जिंदगी पैसा इकट्ठा करने की दौड़ में इंसान अपना स्वास्थ्य, समय और खुशियाँ दांव पर लगा देता है। सोचता है कि रिटायरमेंट के बाद जिंदगी एंजॉय करेंगे, लेकिन हकीकत में उस उम्र में शरीर साथ नहीं देता। तब वही पैसा बच्चे और रिश्तेदार खर्च करते हैं, जिसके लिए इंसान ने अपनी पूरी जवानी खपा दी।
विशेषज्ञों और समाज के अनुभवी लोगों का कहना है कि इंसान को जहां है, वहीं रुककर जिंदगी का आनंद लेना चाहिए। भगवान ने जो दिया है, उसमें संतोष और खुशी ढूंढनी चाहिए।
जिंदगी का असली सच यही है—आज में जीना सीखिए, क्योंकि कल सिर्फ यादें रह जाती हैं।
Jharkhand aajtak news 
                M.K

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